सिधरिया ड्रेन में डूबने से तीन मासूम बहनों की मौत, 12 घंटे बाद मिले शव,गांव मे मचा चीख पुकार
Death: कुशीनगर में नेबुआ नौरंगिया थाना क्षेत्र के दुबौली गांव के समीप सिधरिया ड्रेन में शुक्रवार शाम हुए दर्दनाक हादसे ने पूरे इलाके को गमगीन कर दिया। एक ही परिवार की तीन मासूम बहनों की ड्रेन में डूबने से मौत हो गई। करीब 12 घंटे तक चले खोज अभियान के बाद शनिवार सुबह ग्रामीणों ने तीनों बच्चियों के शव बरामद किए। पुलिस ने पंचनामा भरकर शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।
दुबौली गांव निवासी रामअधार के अनुसार उनके बड़े पुत्र शंभू की बेटियां सपना (10) और छोटी (8) तथा छोटे पुत्र रंजीत की बेटी कुंजन (12) शुक्रवार शाम खेत से घास काटकर घर लौट रही थीं। बभनौली गांव के समीप सिधरिया ड्रेन की पुलिया पर खड़े होने के दौरान एक बच्ची का पैर फिसल गया और वह तेज बहाव में जा गिरी। उसे बचाने के प्रयास में दोनों अन्य बच्चियां भी पानी में समा गईं।सपना के छोटे भाई कलुआ के शोर मचाने पर ग्रामीण मौके पर पहुंचे और देर शाम तक तलाश करते रहे, लेकिन सफलता नहीं मिली। सूचना पर सदर एसडीएम राजीव निगम, तहसीलदार अभिषेक मिश्र, क्षेत्राधिकारी वीरेंद्र सिंह, स्थानीय पुलिस, एनडीआरएफ की टीम तथा जनप्रतिनिधि मौके पर पहुंचे। पूरी रात चले सर्च अभियान के बाद भी बच्चियों का पता नहीं चल सका। शनिवार सुबह ग्रामीणों ने फिर खोज शुरू की और करीब एक घंटे की मशक्कत के बाद तीनों शव बरामद कर लिए।
तीनों शव गांव पहुंचते ही चीख-पुकार मच गई। सपना और छोटी के पिता शंभू राजमिस्त्री हैं, जबकि कुंजन के पिता रंजीत मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करते हैं। एक ही परिवार की तीन मासूम बेटियों की असमय मौत से पूरे गांव में मातम पसरा है।
तीन होनहार बेटियों के साथ बुझ गए परिवार के सपने
-सपना, छोटी और कुंजन केवल परिवार की बेटियां ही नहीं, बल्कि उनके भविष्य की सबसे बड़ी उम्मीद थीं। तीनों मठिया स्थित विद्यालय में पढ़ती थीं और पढ़ाई के साथ घर के छोटे-छोटे कामों में भी माता-पिता का हाथ बंटाती थीं। शिक्षक बताते हैं कि तीनों बच्चियां बेहद अनुशासित, मेहनती और मिलनसार थीं। सपना डॉक्टर बनने का सपना देखती थी, जबकि छोटी और कुंजन भी पढ़-लिखकर परिवार का सहारा बनना चाहती थीं। लेकिन सिधरिया ड्रेन की तेज धार ने पलभर में उनके सभी सपनों को निगल लिया। शनिवार सुबह जब तीनों के शव एक साथ गांव पहुंचे तो हर आंख नम थी। गांव के लोग बस यही कहते रहे कि काश, ये बेटियां आज भी मुस्कुराते हुए स्कूल जाने की तैयारी कर रही होतीं।
मांओं की चीत्कार सुन हर आंख हुई नम
-शनिवार सुबह जैसे ही तीनों बच्चियों के शव गांव पहुंचे, पूरे माहौल में मातम छा गया। सपना और छोटी की मां सुभावती बेटियों के शव से लिपटकर बार-बार बेसुध हो जातीं और होश में आते ही उन्हें पुकारकर विलाप करने लगतीं। दूसरी ओर कुंजन की मां रावड़ी अपनी इकलौती बेटी को सीने से लगाने की कोशिश करती रहीं। उनका करुण क्रंदन सुनकर मौजूद लोगों की आंखें भर आईं। परिजन और महिलाएं उन्हें संभालने की कोशिश करती रहीं, लेकिन मां का दर्द किसी से देखा नहीं जा रहा था। गांव की गलियां चीख-पुकार से गूंज उठीं और वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं।
अधूरे रह गए मासूम सपने, गम में डूबा पूरा गांव
-शुक्रवार तक जिन बच्चियों की किलकारियों से घर और आंगन गूंजता था, शनिवार को उसी घर से तीन अर्थियां एक साथ उठने की तैयारी होने लगी। सपना, छोटी और कुंजन के जाने से पूरे गांव का माहौल शोक में डूब गया। हर घर में इसी हादसे की चर्चा रही और लोग स्तब्ध नजर आए। ग्रामीणों ने बताया कि तीनों बच्चियां सभी की चहेती थीं। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि घास काटने निकली बेटियां कभी वापस नहीं लौटेंगी। गांव के बुजुर्गों ने इसे परिवार पर टूटा सबसे बड़ा वज्रपात बताया। शोक संवेदना व्यक्त करने वालों का दिनभर तांता लगा रहा और हर कोई गमगीन परिवार को ढांढस बंधाता रहा।
एक साथ उठीं तीन अर्थियां, चीख-पुकार से कांप उठा पूरा जवार
शनिवार की सुबह दुबौली गांव का वह दृश्य जिसने देखा, उसकी आंखें नम हो गईं। जिस आंगन में शुक्रवार तक तीन मासूम बहनों सपना, छोटी और कुंजन की किलकारियां गूंजती थीं, वहीं शनिवार को तीनों के निर्जीव शरीर एक साथ पहुंचे तो पूरा गांव करुण क्रंदन से भर उठा। मांओं की चीत्कार, पिता की बेबस निगाहें और परिजनों की सिसकियां सुनकर हर आंख छलक पड़ी।
रातभर गांव के लोग सिधरिया ड्रेन के किनारे उम्मीद का दामन थामे बैठे रहे। किसी को भरोसा नहीं था कि घास काटकर घर लौट रही बेटियां हमेशा के लिए बिछुड़ जाएंगी। सुबह जब ग्रामीणों ने अथक प्रयास के बाद तीनों के शव बाहर निकाले, तो कुछ पल के लिए पूरा इलाका स्तब्ध रह गया। सन्नाटा ऐसा था कि सिर्फ परिजनों की रुलाई सुनाई दे रही थी।
गांव पहुंचते ही मां सुभावती बेटियों सपना और छोटी के शव से लिपटकर बार-बार बेसुध हो जातीं। दूसरी ओर कुंजन की मां रावड़ी अपनी इकलौती बेटी को सीने से लगाने की कोशिश करती रहीं। उनका करुण विलाप सुनकर आसपास खड़े लोग भी अपने आंसू नहीं रोक सके। महिलाओं की सिसकियां और बुजुर्गों की नम आंखें इस दर्दनाक हादसे की मूक गवाह बनी रहीं।
ग्रामीण बताते हैं कि तीनों बच्चियां पढ़ाई में होनहार, व्यवहार में विनम्र और पूरे गांव की चहेती थीं। स्कूल से लौटने के बाद घर के कामों में माता-पिता का हाथ बंटाती थीं। किसी ने कभी नहीं सोचा था कि रोज की तरह घास काटने निकलीं ये मासूम बेटियां फिर कभी घर नहीं लौटेंगी।आज भी सिधरिया ड्रेन की पुलिया पर बिखरा घास का गट्ठर और पड़ी चप्पलें उस दर्दनाक शाम की कहानी बयां कर रही हैं। पूरे गांव में शोक की लहर है और हर जुबां पर बस एक ही सवाल है—क्या ये मासूम बेटियां बच सकती थीं?
.
