OBC आरक्षण पर हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची योगी सरकार, SLP दायर
OBC: यूपी में ओबीसी आरक्षण के बिना ही निकाय चुनाव कराने के हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ
योगी सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। गुरुवार को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की।
सरकार ने ओबीसी के आरक्षण के लिए बने आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही चुनाव की मंजूरी देने
का आग्रह किया है। एसएलपी में कहा गया है कि आयोग का गठन कर दिया गया है।
आरक्षण की प्रक्रिया पूरी करने के बाद चुनाव कराया जाएगा।
अदालत ने सुनवाई के लिए दो जनवरी की तारीख तय कर दी है।
हाईकोर्ट ने बिना ओबीसी (OBC) आरक्षण ही निकाय चुनाव कराने का आदेश यूपी सरकार को दिया है।
इससे पहले बुधवार को योगी सरकार ने ओबीसी आरक्षण देने के लिए आयोग का गठन कर दिया था।
आयोग में अध्यक्ष के साथ चार सदस्यों को नामित किया गया है। सेवानिवृत्त न्यायाधीश को अध्यक्ष बनाया गया है।
आयोग में दो पूर्व आईएएस और दो न्यायिक क्षेत्र से जुड़े लोगों को सदस्य बनाया गया है।
सीएम योगी ने मंगलवार को हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद ही आयोग का गठन करने और
ओबीसी (OBC) को आरक्षण देने के बाद ही चुनाव कराने की घोषणा की थी।
आयोग के गठन से पहले योगी सरकार ने बुधवार को ओबीसी आरक्षण के लिए आयोग गठन को
कैबिनेट बोईसर्कुलेशन से मंजूरी दी थी। आयोग में सेवानिवृत्त न्यायाधीश राम अवतार सिंह को अध्यक्ष बनाया
गया है। सेवानिवृत्त आईएएस चोब सिंह वर्मा, पूर्व आईएएस महेंद्र कुमार, पूर्व अपर विधि परामर्शी संतोष कुमार विश्वकर्मा
और पूर्व अपर विधि परामर्शी व अप जिला जज ब्रजेश कुमार सोनी को सदस्य नामित किया गया है।
क्या है हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए निकाय चुनावों के लिए
जारी 5 दिसम्बर 2022 के ड्राफ्ट नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया है।
इस ड्राफ्ट नोटिफिकेशन के जरिए सरकार ने एससी, एसटी व ओबीसी के लिए
आरक्षण प्रस्तावित किया था। न्यायालय ने अपने 87 पेज के निर्णय में यह भी कहा कि
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्देशित ट्रिपल टेस्ट के बगैर ओबीसी आरक्षण नहीं लागू किया जाएगा।
कोर्ट ने एससी/एसटी वर्ग को छोड़कर बाकी सभी सीटों को सामान्य सीटों के तौर पर अधिसूचित करने का भी आदेश
दिया है। हालांकि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि महिला आरक्षण संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार दिए जाएं।
न्यायालय ने सरकार को निकाय चुनावों की अधिसूचना तत्काल जारी करने का आदेश दिया है।यह भी टिप्पणी की है
कि यह संवैधानिक अधिदेश है कि वर्तमान निकायों के कार्यकाल समाप्त होने तक चुनाव करा लिए जाएं।
यह निर्णय न्यायमूर्ति देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति सौरभ लवानिया की खंडपीठ ने वैभव पांडेय समेत
कुल 93 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए पारित किया। इनमें 15 जनहित याचिकाएं थीं।
न्यायालय ने 12 दिसम्बर 2022 के उस शासनादेश को भी निरस्त कर दिया है जिसमें निकायों का कार्यकाल समाप्त
होने पर इनके बैंक अकाउंट प्रशासकीय अधिकारियों के नियंत्रण में दे दिए गए थे।
ट्रिपल टेस्ट के बिना आरक्षण नहीं
न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि के कृष्ण मूर्ति व विकास किशनराव गवली मामलों में दिए
ट्रिपल टेस्ट फार्मूले को अपनाए बगैर ओबीसी आरक्षण नहीं दिया जा सकता।
संविधान के अनुच्छेद 243-यू के तहत निकायों के कार्यकाल समाप्त होने के पूर्व चुनाव करा लेने चाहिए
जबकि ट्रिपल टेस्ट कराने में काफी वक्त लग सकता है, लिहाजा निकायों के लोकतान्त्रिक स्वरूप को मजबूत रखने
के लिए व संवैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए, यह आवश्यक है कि निकाय चुनाव जल्द करा लिए जाएं।
क्या है ट्रिपल टेस्ट
शीर्ष अदालत के निर्णयों के तहत ट्रिपल टेस्ट में स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण दिए
जाने के लिए एक समर्पित आयोग का गठन किया जाता है जो स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति व प्रभाव की
जांच करता है, तत्पश्चात ओबीसी के लिए आरक्षित सीटों को प्रस्तावित किया जाता है
तथा उक्त आयोग को यह भी सुनिश्चित करना होता है कि एससी,
एसटी व ओबीसी आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक न होने पाए।
