Mandir: वैज्ञानिक भी मानते हैं चमत्कार, ऐसा मंदिर जहां भगवान पीते हैं शराब,जानिए पूरा रहस्य
Mandir:धार्मिक नगरी अवन्तिका उज्जैनी जिसे सबसे पहले महाकाल वन के नाम से जाना गया.
जहां भगवान शिव कई रूपो में विराजमान है. यहां शहर से 8 किलोमीटर करीब दूर एक ऐसा प्राचीन और
रहस्यमयी मंदिर है. जहां भगवान कालभैरव हर रोज मंत्रोच्चार के बाद करीब 2,000 शराब की
बोतलों का सेवन करते हैं. बाबा कालभैरव के शराब पीने के रहस्य के बारे में आज तक
शोध करने वाले पुरात्तव विभाग भी नहीं पता लगा पाया है. बाबा काल भैरव का मंदिर मां क्षिप्रा नदी किनारे
ओखलेश्वर जाग्रत शमशान के समीप भैरव पर्वत नामक स्थान पर स्त्तिथ है,
जहां पास ही में पाताल भैरवी गुफा भी है. आइए जानते हैं इस मंदिर के रहस्य और महत्व के बारे में…
मत्रोंच्चार के बाद करते हैं शराब का सेवन
मंदिर के मुख्य पुजारी बताते है कि मंदिर के पट हर रोज सुबह 06 बजे खुलते हैं.
सुबह 07 से 08 बजे तक भगवान कालभैरव की आरती होतीं है
और शाम को 06 से 07 बजे के बीच भगवान की आरती होती है,
मंदिर में दीप स्तंभ प्रज्वलित किए जाते हैं तो वहिं मंदिर से जुड़ी कहानी की बात करें
तो यहां मंदिर में आम दिनों में हर रोज भगवान को करीब 2000 शराब की बोतलों का भोग लगता है.
ऐसी मान्यता है कि भगवान काल भैरव को मदिरा का भोग लगाने के बाद उसे प्रसाद के रूप में सेवन करने से शरीर के
सभी रोग दूर हो जाते हैं. साथ ही सभी तरह के पापों से मुक्ति मिलती है
. मंदिर के बाहर हर तरह में ब्रांड की महंगी से महंगी शराब हमेशा मिलती है.
उसे प्रशासन की अनुमति से ही बेचा जाता है. मंदिर में बाहर आबकारी विभाग का भी काउंटर है,
जहां महिल पुरुष की अलग-अलग कतार है. इसके साथ ही आस-पास की दुकान वाले भी शराब खुले आम बेचते हैं.
काल भैरव मंदिर का पौराणिक महत्व
एक बार एक पर्वत पर भगवान ब्रह्मा, विष्णु महेश बैठ कर चर्चा कर रहे थे.
इस संसार का सबसे बड़ा देव कौन है, ब्रह्मा कहते है उत्तप्ति मैनें की तो मैं बड़ा हूं, विष्णु जी कहते है
मैं पालनहारी हूं. इसलिए मैं बड़ा हूं, महेश शिव कहते है संघारकर्त्ता तो मैं बड़ा हुआ.
जब इस चर्चा का निष्कर्ष नहीं निकलता है तो भगवान अपने अपने लोक में चले गए.
अब ब्रह्मा जी के 5 मुख थे तो उन्होंने 4 से चार वेदों की रचना कर दी.
अब पांचवे मुख से भी वे एक और रचना ”रचना” चाहते थे, लेकिन उसके बारे में
भगवान शिव को पता चल जाता वे मना करते की यह गलत है. संसार के लिए,
लेकिन ब्रह्मा जी नहीं माने और रचना करने लगे. ऐसे में शिव क्रोधित हो उठे और उनका तीसरा नेत्र खुल गया.
जैसे ही नेत्र खुला तो उस नेत्र से एक ज्योति प्रकट हुई. 5 साल के बालक के रूप में बटुक भैरव जिसे कहा गया.
बटुक भैरव ब्रह्मा जी को मनाने गए. लेकिन ब्रह्मा जी की जिद और वे बटुक भैरव को बालक समझ कर
उसका तिरस्कार कर दिए, जिससे बटुक भैरव को क्रोध आया और वे 5 साल की उम्र में ही मदिरा पान कर लिए.
जिन्हें आज श्री काल भैरव जी महाराज कहा जाता है, बटुक भैरव मदिरा का पान करने के बाद क्रोध में आकर
कालभैरव का रूप धारण कर लिए और ब्रह्मा जी के पांचवे मुख का तीक्ष्ण उंगली से छेदन कर दिए.
जिससे काल भैरव को ब्रह्म हत्या का दोष लग गया. वे शिव के पास आते है
और उस दोष के निवारण हेतु उचित मार्ग की बात रखते है. शिव उन्हें भ्रमण करने को कहते है
और भ्रमण के दौरान ही कालभैरव उज्जैनी अवन्तिक नगरी में शिप्रा स्नान कर महाकाल वन में
दर्शन कर पर्वत पर तपस्या करते हैं. यह जगह भैरव पर्वत के नाम से ही जानी जाती है,
और यहीं तपस्या के दौरान भैरव को ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति मिली.
पीने के बाद मदिरा का नहीं चलता है पता
मंदिर के मुख्य पुजारी बताते हैं कि मंदिर में वाम मार्गीय (तांत्रिक) पूजन का विधान रहा है,
जिसमें भगवान को 5 तत्वों का भोग लगता है, मांस, मदिरा, मछली, मुर्गा व अन्य समय के चलते प्रशासन ने
बंद करा दिया. लेकिन शराब आज भी यहां भगवान को भोग में चढ़ाई जाती है
. भगवान उस मदिरा को मंत्र उच्चार के साथ स्वयं पी जाते है. पीने के बाद मदिरा अदृश्य हो जाती है.
भगवान काल भैरव के मदिरा पान के लिए यहां भारत सरकार द्वारा शोध किया गया.
लेकिन वो शोध भी सफल नहीं हो पाया और ये रहस्य आज तक बना हुआ है.
भगवान की महिमा है, यह चमत्कार ही है. यहां क्योकि श्री काल भैरव यहां स्वयं विद्दमान है.
पुजारी बताते हैं कि भगवान कालभैरव नगर रक्षा के लिए महाकाल वन
में विराजमान है भगवान महाकाल महाराज के सेनापति के रूप में है.
जानिए क्या कहना है पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर का
पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर रमण सोलंकी बताते हैं कि काल भैरव मंदिर अति प्राचीन मंदिर है,
क्योंकि ये राजधानी के रूप में पूरा क्षेत्र रहा है. एक समय में कालभैरव पीठाधीश्वर कहलाये हैं.
चंद्र प्रद्योत का शासन काल हो, सम्राट अशोक का शासन काल हो या राजा विक्रमादित्य का शासन काल हो इनकी
कहानियां काफी प्रचलित रही. राजा विक्रमादित्य के शासन काल में कालभैरव की सवारी निकलना शुरू हुई.
विशेष रूप से जो मदिरा पान की कहानी हमें मिलती है, वो राजा विक्रमादित्य के काल से आज तक हम सुन रहे हैं और देख रहे हैं.
मदिरा को लेकर हुआ काफी शोध
प्रोफेसर ने बताया कि मदिरा के रहस्य को जानने के लिए पद्म श्री डॉ॰ विष्णु श्रीधर वाकणकर जिन्हें
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पुरातत्व के कार्यो को लेकर पद्म श्री से नवाजा.
उन्होंने यहां शोध किया क्योंकि लोगों का मानना था कि मंदिर क्षिप्रा नदी के किनारे बसा हुआ है
और शराब पानी में घुल जाती है. बह जाती है. लेकिन खुदाई के वक्त पाया कि ऐसी कोई
जगह यहां नहीं है. जहां से मदिरा जा सके. ये एक रहस्य है जो बना हुआ है.
पत्थर तो एब्जॉर्ब नहीं कर लेते?
जब पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर रमण सोलंकी से हमने पूछा कि कहीं मदिरा पत्थर तो एब्जॉर्ब नहीं कर लेते तो
उन्होंने जवाब देते हुए बताया कि ये जो प्रतिमा है और मंदिर में लगे पत्थर मालवा के बेसॉल्ट से बनी है,
जिसमें जितना पानी डालोगे बह कर निकल जाएगा, क्योंकि शोध के वक्त प्रतिमा
और आस पास लगा सिंदूर निकलने पर ये ज्ञात हुआ यहां कोई ऐसा पत्थर नहीं है,
जो किसी तरल पदार्थ को सोख सके. वहीं प्रोफेसर ने आगे कहा कि दो प्रकार के भैरव होते है
एक काल भैरव व दूसरे गौरा भैरव, जिसमें गौरा भैरव शुद्ध होते हैं
और वे मदिरा पान नहीं करते है. जबकि काल भैरव मास मदिरा का सेवन करते हैं.
कालभैरव पूरे क्षेत्र की करते हैं रक्षा
प्रोफेसर ने कालभैरव के बारे में अधिक जानकारी देते हुए कहा कि वे पूरे क्षेत्र का रक्षा करते है
क्षेत्र पर उनका अधिपत्य होता है और वे महाकाल बाबा के प्रतिनिधि के रूप में यहां वीराजमान है.
इसलिए यहां जितने शासक रहे वो काल भैरव की पूजा पद्धति में संलग्न रहे हैं,
विशेष कर राजा विक्रमादित्य के काल से हर्षवर्धन के काल, उदयादित्य के काल,
राजा भोज के काल की पूजन पद्धति के प्रमाण यहां मिलते रहते हैं.
पास ही में है ओखलेश्वर शमशान
प्रोफेसर रमण सोलंकी बताते है की उज्जैन कर्क रेखा पर स्थापित होने के कारण यहां तंत्र क्रियाएं होती है
और यह पूरे विश्व की नाभि केंद्र कहलाती है. इसलिए इस जगह का विशेष महत्व हो जाता है.
यहां ओखलेश्वर शमशान है यह जाग्रत शमशान है, मंदिर के पास जहां
विश्व भर के तांत्रिक समय-समय पर तंत्र साधना करने पहुंचते हैं
और यह कालभैरव का मंदिर ओखलेश्वर शमशान के नजदीक ही स्थापित है.
अकबर व सिंधिया से जुड़ी है मंदिर की कहानी
प्रोफेसर बताते हैं कि यहां जमीन के अंदर एक कक्ष बना हुआ है,
जिसे पाताल भैरवी गुफा के नाम से आज सब जानते है, जिसमें तंत्र साधना का यहां प्रमाण प्राप्त होता है.
दिल्ली का शासक रहा अकबर जब उज्जैन आया तो उसने इस मंदिर को महिमा को समझा और
ओखलेश्वर शमशाम व मन्दिर के बीच एक प्राचीन दीवार बनवाई.
जब सिंधिया का शासन यहां हुआ तो वे कालभैरव को कुल देवता के रूप में पूजने लगे.
आज भी मंदिर में सवारी के दौरान सिंधिया राजाघरने की पगड़ी भगवान को चढ़ाई जाती है.
