Lok Sabha Elections: अखिलेश और विपक्षी दलों के PDA में क्या है अंतर, आखिर यही नाम क्यों?
Lok Sabha Elections: मिशन 2024 यानी अगले लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार को
चुनौती देने के लिए विपक्षी दलों की मोर्चेबंदी शुरू हो चुकी है। पटना में 15 विपक्षी दलों ने शुक्रवार
को बैठक की और भाजपा के खिलाफ एकजुटता का प्रदर्शन किया।
पिछले चुनावों तक भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन NDA के खिलाफ विपक्ष का UPA मैदान में
उतरता रहा है। इस बार विपक्षी गठबंधन का नाम PDA रखने की चर्चा है।
हालांकि नाम पर अंतिम मुहर शिमला बैठक में अगले महीने लगने की संभावना है।
इससे पहले यूपी में अखिलेश यादव भी PDA के नाम से गठबंधन बनाकर
भाजपा के खिलाफ अपनी मुहिम को तेज कर चुके हैं।
विपक्षी दलों और अखिलेश के गठबंधन का नाम सुनने में भले
ही एक लगे लेकिन दोनों का मतलब बिल्कुल अलग है।
अखिलेश ने P से पिछड़ा, D से दलित और A से अल्पसंख्यक को अपने साथ जोड़ने की बात
कहते हुए PDA बनाया है। जबकि विपक्षी दलों के PDA का मतलब
Patriotic Democratic Alliance है। इसे हिन्दी में देशभक्त लोकतांत्रिक
गठबंधन कहेंगे। इस नाम के पीछे भी खास रणनीति है।
विपक्षी दलों का पिछले नौ सालों से केंद्र की मोदी सरकार पर सबसे बड़ा आरोप यही है
कि वह तानाशाही कर रही है। उसके खिलाफ बोलने वाले छात्रों, किसानों,
एनजीओ या राजनीतिक दलो को देशद्रोही बता दिया जाता है।
विपक्ष यह भी कहता रहा है कि इस सरकार में लोकतंत्र और देश का संविधान खतरे में हैं।
सार्वजनिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं को बर्बाद किया जा रहा है।
इन्हीं आरोपों का जवाब देने के लिए विपक्षी दलों ने देशभक्त लोकतांत्रिक गठबंधन यानी
PDA नाम देने का फैसला किया है। ऐसे में उनके गठबंधन में ही नहीं उसके नाम में भी
लोकतंत्र और देशभक्ति दोनों की झलक दिखाई देगी। विपक्षी दलों का मानना है
कि भाजपा की तरफ से किसी को भी देशद्रोही कह देने का भी जवाब मिल जाएगा।
विपक्षी दलों की अगली बैठक शिमला में 12 से 15 जुलाई के बीच संभावित है।
माना जा रहा है कि इस बैठक में गठबंधन का नाम तय होने के साथ ही
संयोजक के नाम पर भी मुहर लग जाएगी। बिहार के सीएम नीतीश कुमार की पहल पर 23 मार्च को
पटना में हुई बैठक में राज्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ ही कुल 15 दलों के नेता शामिल हुए थे।
पिछले नौ सालों में यह विपक्षी दलों की सबसे बड़ी बैठक थी।
इसमें बंगला की सीएम ममता बनर्जी, तमिलनाडु के सीएम स्टालिन, झारखंड के
सीएम हेमंत सोरेन और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल पहुंचे थे।
इसके अलावा कांग्रेस के राहुल गांधी, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, एनसीपी प्रमुख शरद यादव ने
शिरकत की थी। हालांकि बैठक के पीछे राजद प्रमुख लालू यादव की भूमिका सबसे बड़ी मानी
जा रही है। बैठक के बाद हुई प्रेस कांफ्रेंस को भी सबसे पहले नीतीश और सबसे अंत में लालू ने
संबोधित किया था। ऐसे में इशारा साफ था कि मोदी विरोध की
धुरी नीतीश और लालू ही इस बार भी बनने जा रहे हैं।
