MANREGA:मनरेगा पर पहली बार खर्च सीमा लागू, ग्रामीण रोजगार पर असर की आशंका
MANREGA: केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) पर पहली बार खर्च सीमा लागू की है।
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने वित्तीय वर्ष 2025-26 की पहली छमाही (अप्रैल-सितंबर) में मनरेगा के तहत होने वाले खर्च को कुल वार्षिक बजट का 60 फीसदी तक सीमित कर दिया है।
यह फैसला मांग आधारित इस योजना के लिए अभूतपूर्व है, क्योंकि अब तक इसमें खर्च की कोई सीमा तय नहीं थी।
वित्त मंत्रालय का निर्देश
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने ग्रामीण विकास मंत्रालय को निर्देश दिया है कि मनरेगा को मासिक/त्रैमासिक व्यय योजना (MEP/QEP) के दायरे में लाया जाए।
यह व्यवस्था कैश फ्लो और गैर-जरूरी उधारी को नियंत्रित करने के लिए 2017 में शुरू की गई थी, लेकिन मनरेगा को इससे छूट थी।
पिछले महीने 29 मई को वित्त मंत्रालय ने एक पत्र जारी कर 60 फीसदी खर्च की सीमा लागू करने की जानकारी दी।
ग्रामीण विकास मंत्रालय का प्रस्ताव खारिज
ग्रामीण विकास मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय को पहली दो तिमाहियों के लिए अधिक खर्च सीमा का प्रस्ताव दिया था, लेकिन इसे खारिज कर दिया गया।
नए नियम के तहत, सितंबर 2025 तक 86,000 करोड़ रुपये के कुल बजट में से केवल 51,600 करोड़ रुपये ही खर्च किए जा सकेंगे।शेष 40 फीसदी राशि अगली छमाही में खर्च होगी।
रोजगार पर असर की आशंका
अधिकारियों के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष की 21,000 करोड़ रुपये की देनदारियां बकाया हैं। नई खर्च सीमा से मनरेगा के तहत रोजगार सृजन प्रभावित हो सकता है।
यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब 100 दिन की रोजगार गारंटी को बढ़ाकर 150 दिन करने और दैनिक मजदूरी को 370 रुपये से बढ़ाकर 400 रुपये करने की मांग जोर पकड़ रही है। कुछ राज्यों में मजदूरी पहले ही 400 रुपये प्रतिदिन है।
मनरेगा का महत्व
मनरेगा ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क निर्माण, सिंचाई, और जल संरक्षण जैसे कार्यों के जरिए लाखों श्रमिकों को रोजगार देती है। खर्च सीमा लागू होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार अवसरों पर असर पड़ सकता है।
