प्राथमिक विद्यालय को बचाने की अनूठी जिद, बीएचयू के पूर्व छात्रों की पहल की हर कोई कर रहा तारीफ
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से 50 से कम छात्र संख्या वाले प्राथमिक विद्यालयों को मर्ज करने की योजना ने जहां एक ओर विवाद खड़ा कर दिया है, वहीं कुशीनगर के पडरौना ब्लॉक के प्रधान पट्टी गांव में दो युवाओं की अनूठी पहल ने सभी का ध्यान खींचा है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के दो पूर्व छात्रों, दिनेश कुमार और फैज उर्फ रिंकू, ने अपने गांव के प्राथमिक विद्यालय को विलय से बचाने के लिए कमर कस ली है। उनकी इस जिद और मेहनत की हर कोई तारीफ कर रहा है।
दो दिनों में बढ़ाई छात्र संख्या, जागरूकता से बदली तस्वीर
दिनेश कुमार, जो बी.एड. और जेआरएफ क्वालिफाइड हैं और इस विद्यालय में अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं, साथ ही रिंकू, जो बीएचयू से इंग्लिश ऑनर्स, एलएलबी, एलएलएम और वर्तमान में गोरखपुर विश्वविद्यालय में कानून के शोध छात्र हैं, ने मिलकर विद्यालय को बचाने का संकल्प लिया। मात्र दो दिनों में, इन दोनों ने घर-घर जाकर ग्रामीणों को शिक्षा के महत्व और सरकार की योजनाओं के बारे में जागरूक किया। नतीजतन, उन्होंने 50 से अधिक बच्चों का नामांकन विद्यालय में करा दिया, जिससे स्कूल को विलय से बचाने की उम्मीद जगी है।
विलय नीति को बताया संविधान का उल्लंघन
रिंकू ने सरकार के विद्यालय विलय के निर्णय को संविधान के अनुच्छेद 21ए, नीति निदेशक तत्व अनुच्छेद 45, और शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 का उल्लंघन करार दिया। उनका कहना है कि यह नीति 6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित करती है। विलय के कारण बच्चों को दूर के स्कूलों में जाना पड़ेगा, जो खासकर छोटे बच्चों के लिए असुरक्षित और मुश्किल भरा हो सकता है।
गांव की अस्मिता से जुड़ा है विद्यालय
रिंकू ने कहा, “यह विद्यालय हमारे गांव की विरासत है। हमने यहीं से अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। भले ही गांव में कई निजी स्कूल हों, लेकिन इस विद्यालय का अपना एक अलग इतिहास और महत्व है। यह हमारी अस्मिता का प्रतीक है।” दिनेश और रिंकू की इस पहल ने न केवल ग्रामीणों को प्रेरित किया, बल्कि शिक्षा के प्रति उनकी जागरूकता को भी बढ़ाया है।
हाई कोर्ट की नाराजगी, विरोध की गूंज
उत्तर प्रदेश सरकार की इस विलय नीति का शिक्षक संगठनों और जिम्मेदार नागरिकों द्वारा तीखा विरोध किया जा रहा है। हाई कोर्ट ने भी बिना पूर्व रिपोर्ट के इस नीति पर नाराजगी जताई है। ऐसे में दिनेश और रिंकू की यह पहल न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि पूरे क्षेत्र में एक मिसाल बन रही है।
ग्रामीणों का मिला साथ
दिनेश और रिंकू की मेहनत रंग लाई और ग्रामीणों ने भी उनका पूरा साथ दिया। ग्रामवासियों का कहना है कि यह विद्यालय उनके बच्चों के भविष्य का आधार है और इसे बचाने के लिए वे हर संभव प्रयास करेंगे। इस पहल ने न केवल विद्यालय को बंद होने से बचाने की उम्मीद जगाई है, बल्कि शिक्षा के महत्व को भी घर-घर पहुंचाया है।
एक प्रेरणा बन रही कहानी
दिनेश और रिंकू की यह पहल न केवल कुशीनगर, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए एक प्रेरणा बन रही है। उनकी मेहनत और जज्बे ने साबित कर दिया है कि अगर ठान लिया जाए, तो छोटे से प्रयास से भी बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। अब देखना यह है कि क्या उनकी यह मुहिम अन्य गांवों के लिए भी प्रेरणा बनेगी और सरकार इस नीति पर पुनर्विचार करेगी।
