Gay marriage:बच्चे पैदा न होने से देश बुजुर्ग हो रहे… राष्ट्र दम तोड़ देगा, समलैंगिक विवाह पर सुप्रीम कोर्ट में दिलचस्प दलील
gay marriage: समलैंगिकों के विवाह के अधिकार का मामला गरम है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मंगलवार को बच्चों के जन्म की भी चर्चा हुई। मध्य प्रदेश सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने अपने तर्क से महिला-पुरुष की शादी के व्यापक पहलू को समझाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि महिला-पुरुष कपल को रीति-रिवाज, कानून और धर्म के अनुसार शादी का अधिकार है।
उन्होंने कोर्ट से फिर आग्रह किया कि इस मुद्दे को संसद पर छोड़ दिया जाए। gay marriage के खिलाफ अपनी दलीलें रखते हुए द्विवेदी ने कहा कि बच्चे पैदा न करने से कई देशों में बुजुर्ग आबादी बढ़ रही है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि संतान उत्पत्ति के उद्देश्य के बगैर की जाने वाली शादी से राष्ट्र खत्म हो जाएगा। वकील का तर्क बदलाव के खिलाफ था।
इस पर जस्टिस भट ने कहा कि पहले अंतर-जातीय विवाह की अनुमति नहीं थी और अंतर-धार्मिक विवाह 50 साल पहले अनसुना था। उन्होंने कहा, ‘संविधान अपने आप में परंपरा को तोड़ने वाला है क्योंकि पहली बार आप अनुच्छेद 14 लाए हैं। अगर आप अनुच्छेद 14, 15 और 17 लाए हैं तो वे परंपराएं टूट गई हैं।’ इस पर द्विवेदी ने तर्क रखा कि बदलाव विधायिका ने किए जो रीति-रिवाज बदल सकती है।
एमपी सरकार के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि विवाह एक सामाजिक संस्था है। ऐसा नहीं है कि रातोंरात कुछ हो रहा है और दो लोग आकर कह रहे हैं कि यह एक विवाह है। विवाहरूपी संस्था समाज से उभरी है। बहुत सारे विकास हुए हैं। मुद्दा यह है कि सभी सुधार विधायिका ने महिलाओं और बच्चों के हित में किए। वे मौलिक पहलू (विवाह की सामाजिक संस्था के मौजूदा मूल पहलू) को नहीं बदलते हैं।
चीफ जस्टिस ने विवाह और परिवार पर अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि विवाह एक परिवार की धारणा, एक परिवार इकाई का अस्तित्व है क्योंकि दो लोग जो विवाह में साथ आते हैं, एक परिवार बनाते हैं। सीजेआई ने कहा कि विवाह का बहुत महत्वपूर्ण घटक संतान की उत्पत्ति है।
हो सकता है बच्चे पैदा करने की क्षमता न हो…
चीफ जस्टिस ने कहा, ‘हमें इस तथ्य से परिचित होना चाहिए कि विवाह की वैधता या सामाजिक स्वीकृति केवल इस कारण से संतान की उत्पत्ति पर निर्भर नहीं है क्योंकि हो सकता है कि लोग संतानोत्पत्ति न करना चाहते हों। लोगों में बच्चे पैदा करने की क्षमता या ऐसी स्थिति न हो या ऐसी उम्र में शादी हुई हो जब उनके बच्चे नहीं हो सकते। लेकिन हम इस बात को मानते हैं कि संतानोत्पत्ति विवाह का एक महत्वपूर्ण पहलू है।’
वकील ने आगे कहा कि सबसे अहम एक सामाजिक उद्देश्य के लिए पुरुष और महिला का एकीकरण है क्योंकि समाज के साथ-साथ नस्ल को भी बनाए रखने की जरूरत है। उन्होंने तर्क दिया, ‘आज हमारी आबादी 44 करोड़ से बढ़कर 1.4 अरब हो गई है, यह उन कुछ खास लोगों की वजह से नहीं है
जो संतान पैदा करने का फैसला नहीं करते या संतान पैदा करने में असमर्थ हैं।’ द्विवेदी ने कहा, ‘विषमलैंगिक विवाह हमारे मनुष्य होने के कारण एक प्राकृतिक अधिकार है। उस अधिकार से इनकार करने का मतलब देश को मरने देना है। यही इसका महत्व है।’
